नई दिल्ली: भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज है। गीत के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर BJP और कांग्रेस के बीच इसके इतिहास, पूरे गीत के इस्तेमाल और 1937 में इसके केवल शुरुआती दो पदों को अपनाए जाने को लेकर तीखी बयानबाजी देखने को मिली है।
एक तरफ BJP का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन और भारतीय राष्ट्रवाद का महत्वपूर्ण प्रतीक है और इसके मूल स्वरूप का सम्मान किया जाना चाहिए। दूसरी ओर कांग्रेस का तर्क है कि पार्टी ने कभी वंदे मातरम् का विरोध नहीं किया, बल्कि ऐतिहासिक परिस्थितियों और धार्मिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखते हुए शुरुआती दो पदों को राष्ट्रीय आंदोलन के लिए स्वीकार किया गया था।
क्या है वंदे मातरम् का इतिहास?
‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। इसे 1875 के आसपास रचा गया और बाद में 1882 में प्रकाशित उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीयों के बीच एक महत्वपूर्ण प्रेरणास्रोत और नारे के रूप में लोकप्रिय हुआ।
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘वंदे मातरम्’ गाया था। इसके बाद यह गीत राष्ट्रीय आंदोलन से और मजबूती से जुड़ गया।
विवाद आखिर शुरू क्यों हुआ?
‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो पदों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली, जल, फसल, चांदनी और मातृभूमि के प्रति सम्मान का वर्णन है।
लेकिन बाद के पदों में मातृभूमि को दुर्गा, कमला (लक्ष्मी) और वाणी (सरस्वती) जैसे देवी-रूपों से संबोधित किया गया है। इन्हीं धार्मिक संदर्भों को लेकर उस समय मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों की आपत्ति सामने आई थी।
1937 में कांग्रेस नेतृत्व ने इस विषय पर विचार करते हुए शुरुआती दो पदों को राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए अपनाने का निर्णय लिया। कांग्रेस की उस समय की दलील थी कि पहले दो पदों में ऐसी कोई बात नहीं है जिस पर किसी धार्मिक समुदाय को आपत्ति हो, जबकि बाद के पदों में धार्मिक विचार और संदर्भ मौजूद हैं।
BJP का क्या कहना है?
BJP का आरोप है कि कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में वंदे मातरम् के महत्वपूर्ण हिस्सों को अलग कर दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2025 में संसद में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर हुई चर्चा के दौरान कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा था कि 1937 में गीत के महत्वपूर्ण हिस्सों को हटाने का फैसला देश के राजनीतिक इतिहास में गंभीर गलती थी। BJP नेताओं ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति से भी जोड़ा।
BJP का मूल तर्क है कि वंदे मातरम् स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक रहा है और इसके पूरे स्वरूप को सम्मान मिलना चाहिए। पार्टी के नेताओं का कहना है कि धार्मिक संदर्भ होने के कारण गीत के हिस्सों को हटाना उचित नहीं था।
कांग्रेस का क्या कहना है?
कांग्रेस का कहना है कि पार्टी वंदे मातरम् का सम्मान करती है और स्वतंत्रता आंदोलन में इसके योगदान को स्वीकार करती है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 2025 में कहा था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस वंदे मातरम् की गौरवपूर्ण विरासत की ध्वजवाहक रही है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि कांग्रेस के 1896 के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत सार्वजनिक रूप से गाया गया था।
कांग्रेस का कहना है कि 1937 का निर्णय किसी एक नेता का व्यक्तिगत फैसला नहीं था। पार्टी के नेताओं के अनुसार, उस समय महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू और अन्य नेताओं के बीच व्यापक विचार-विमर्श के बाद ऐसा रास्ता चुना गया, जिससे राष्ट्रीय आंदोलन में सभी समुदायों की भागीदारी बनी रहे।
क्या सिर्फ दो पद ही राष्ट्रीय गीत हैं?
यह सवाल भी मौजूदा विवाद का अहम हिस्सा है।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा और ‘वंदे मातरम्’, जिसने स्वतंत्रता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, को ‘जन गण मन’ के बराबर सम्मान और दर्जा दिया जाएगा।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि जन गण मन राष्ट्रगान है, जबकि वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत है।
2025-26 में फिर क्यों बढ़ा विवाद?
वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर केंद्र सरकार की ओर से देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस दौरान पूरे गीत को लेकर पुरानी बहस फिर राजनीतिक मुद्दा बन गई।
दिसंबर 2025 में संसद में इस विषय पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और कांग्रेस नेताओं के बीच तीखी बहस हुई। BJP ने कांग्रेस के 1937 के फैसले को लेकर सवाल उठाए, जबकि कांग्रेस ने कहा कि उस समय लिया गया निर्णय ऐतिहासिक परिस्थितियों और सर्वसम्मति बनाने की कोशिश का परिणाम था।
2026 में भी यह विवाद जारी रहा। फरवरी 2026 में गुजरात विधानसभा में वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ को लेकर प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान BJP और कांग्रेस नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप हुए, हालांकि बाद में प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ।
असली मतभेद क्या है?
अगर पूरे विवाद को सरल भाषा में समझें तो BJP और कांग्रेस दोनों वंदे मातरम् के महत्व को स्वीकार करते हैं, लेकिन दोनों दल 1937 में इसके स्वरूप को लेकर लिए गए फैसले की अलग-अलग व्याख्या करते हैं।
BJP का पक्ष:
वंदे मातरम् स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। इसके महत्वपूर्ण पदों को हटाना ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से गलत था।
कांग्रेस का पक्ष:
वंदे मातरम् का सम्मान हमेशा रहा है। शुरुआती दो पदों को अपनाने का फैसला धार्मिक संवेदनशीलताओं और स्वतंत्रता आंदोलन में सभी समुदायों को साथ रखने की कोशिश के तहत लिया गया था।
निष्कर्ष
वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रतीक है। आज इसके 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर छिड़ी राजनीतिक बहस में इतिहास, राष्ट्रवाद, धर्म और राजनीति—चारों पहलू एक साथ दिखाई दे रहे हैं।
इस पूरे विवाद को समझने के लिए यह अंतर याद रखना जरूरी है कि वंदे मातरम् का सम्मान देश के राष्ट्रीय जीवन में स्थापित है, लेकिन इसके पूरे स्वरूप को लेकर ऐतिहासिक मतभेद रहे हैं।
राजनीतिक दल इस इतिहास की अलग-अलग व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन इतिहास को समझने के लिए 1937 के फैसले और 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में की गई घोषणा—दोनों को साथ देखना जरूरी है।
स्रोत: संसद की संविधान सभा कार्यवाही, संसद डिजिटल लाइब्रेरी और समकालीन रिपोर्टों पर आधारित।
रिपोर्ट:- बंटी कुमार
हेडलाइन प्लस न्यूज
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